कोरबा जिला अंतर्गत आनें वाले कटघोरा वन मण्डल के पाली वन परिक्षेत्र के चर्चित रेंजर प्रह्लाद यादव योजनाओं के पैसे का गलत दुरपयोग…

कटघोरा। छत्तीसगढ़ प्रदेश के कोरबा जिला अंतर्गत आनें वाले कटघोरा वन मण्डल के पाली वन परिक्षेत्र के चर्चित रेंजर प्रह्लाद यादव विगत अठारह-बीस महीनों से किसी ना किसी प्रकार से लगातार समाचार पत्रों में सुर्खियाँ बटोरनें में कामयाब हो रहे हैं जबकि मामला इसके ठीक विपरीत है।

आप को बता दें कि कटघोरा वन मण्डल में तत्कालीन वन मण्डलाधिकारी राजेश चन्देले से लेकर नव पदस्थ प्रभारी वन मण्डलाधिकारी शमा फारूकी और अपनें सेवा निवृत्ति के आखरी पड़ाव में आकर निलंबित हुए तत्कालीन प्रभारी वन मण्डलाधिकारी डी.डी.संत, इन सभी के द्वारा अपनें अधीनस्थ कार्यरत अनुविभागीय अधिकारी और सात अन्य वन परिक्षेत्र अधिकारियों के साथ मिलकर वनों के संरक्षण तथा विभिन्न योजनाओं के लिए स्वीकृत अलग-अलग मदों से प्राप्त धन राशियों को बंदरबाट करनें का सिलसिला लंबे समय से अनवरत जारी है,

कटघोरा वन मण्डल क्षेत्र की वृहदता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस वन मण्डल के अंतर्गत सात अन्य बड़े वन परिक्षेत्र जैसे कि:- पाली, चैतमा, जटगा, पसान, केंदई, एतमा नगर और कटघोरा, आते हैं, और इसके आलावा कसनिया काष्टागार और पाली निस्तार डिपो भी इसी वन मण्डल के अंतर्गत आते है,

पिछले दिनों वर्ल्ड बैंक के प्रतिनिधियों का दल कटघोरा वन मण्डल के वन ग्रामों में रहनें वाले आदिवासी समुदाय के विकास एवं उनके रोजगार की उपलब्धता हेतु “ई.एस.आई.पी.” योजना अंतर्गत दिए गए करोड़ों रुपयों के अनुदान राशि की जाॅच-पड़ताल एवं निरीक्षण करनें के लिए कटघोरा वन मण्डल के पाली वन परिक्षेत्र के ग्राम कोड़ार पहुँची थी, लेकिन उन्हें भी चर्चित वन परिक्षेत्र अधिकारी प्रह्लाद यादव नें अपनें मुख्य वन संरक्षक श्री अनिल सोनी और वन मण्डल अधिकारी शमा फारूकी के साथ मिलकर बड़ी ही चालाकी से चिकन पार्टी करवाकर उन्हें रवानगी दे दी, दरअसल यह मामला कुछ ऐसा है कि जिस योजना का निरीक्षण करनें के लिए टीम आईं थी उस योजना की जानकारी हर किसी को नहीं है, इस योजना के तहत आदिवासी ग्रामीणों को स्व-रोजगार के लिए कुटीर उद्योग, जैविक खेती तथा धान कूटनें की मशीन एवं टूल्स उपलब्ध करवाए जाते हैं, परन्तु वन परिक्षेत्र अधिकारी प्रह्लाद यादव नें ग्राम कोड़ार के ग्रामीणों को अंधकार में रखते हुए बाजार से लाए गए वाशिंग पाउडर और चाॅवल बोरियों को वर्ल्ड बैंक से आए प्रतिनिधियों के सामनें शो कर दिया गया, और उन्हें झूठी जानकारी दिया गया कि उक्त सामान को कुटीर उद्योग में ग्रामीणों के द्वारा बनाया गया है, और ऐसा करके उन्होंने खूब वाह-वाही लूटा, इस काले कारनामें में उनका पूरा साथ मुख्य वन संरक्षक तथा वन मण्डल अधिकारी नें दिया जो कि एक जाॅच का विषय है,
पाली वन परिक्षेत्र के चर्चित रेंजर प्रह्लाद यादव के काले कारनामें सिर्फ यहीं पर नहीं रुकते…
वन विभाग के कुख्यात सामग्री सप्लायर संतोष गुप्ता के साथ मिलकर फर्जी बिल के माध्यम से अब तक शासन को करोड़ों रुपयों का चूना लगाया जा चुका है जिसकी जानकारी प्रधान मुख्य संरक्षक श्री राकेश चतुर्वेदी जी को भी है, लेकिन जब कमीशन का ताला मुँह में लगा हो तो कार्यवाही कौन करेगा,
बिना स्वीकृति के करोड़ों रुपयों की बाउंड्रीवाल सिर्फ चंद लाख रूपए खर्च करके बना दी गईं और करोड़ों रुपयों की बिल लगवाकर फिर से शासन को चूना लगानें की पूरी तैयारी हो चुकी है, सारे बिल और व्हाउचर वन मण्डल अधिकारी कटघोरा के टेबल पर रखा हुआ है जैसे ही मैडम जी का कमीशन तय हुआ कि पूरा मामला खतम,

पाठकों को इतनें विस्तार से इस वन मण्डल का परिचय देना इसलिए भी आवश्यक है कि जिससे यह अंदाजा लगाया जा सके कि इतनें बड़े वन मण्डल में आर्थिक अनियमितताएं और भ्रष्टाचार की घटनाएं भी कितनें वृहद पैमानें पर हो रही है, इस वन मण्डल में शासन की विभिन्न योजनाओं जैसे कि:- विभागीय मद, कैम्पा मद, ग्रीन इंडिया मिशन, ई.एस.आई.पी. और क्षतिपूर्ति, वृक्षारोपण जैसे मदों के माध्यम से हर वर्ष करोडों रुपयों की स्वीकृति आती है, जिसका इस्तेमाल अलग-अलग कार्यों के लिए किया जाता है लेकिन इस वन मण्डल में पदस्थ सभी अधिकारियों को भ्रष्टाचार के नशे की ऐसी लत लगी हुई है जो छूटती ही नहीं है, इनके द्वारा योजनाओं के सम्पादन के लिए आई हुई सम्पूर्ण धनराशि का लगभग 65% हिस्सा आपस में ही बंदरबाट कर लिया जाता है, इनके द्वारा ऐसे सप्लायर्स को सामग्री सप्लाई का आदेश दिया जाता है जो इन्हें बिना सामग्री सप्लाई किए ही पक्का बिल उपलब्ध करवा सके, इसमें प्रत्येक बिल के लिए सप्लायर्स को 8-10% का भुगतान किया जाता है,
उपरोक्त सभी बातों का प्रमाण हमारे प्रधान संपादक के पास सुरक्षित है,

यह किस्सा सिर्फ एक कटघोरा वन मण्डल का ही नहीं है अमूमन पूरे प्रदेश के सभी वन मण्डलों में यही हाल है इस पर रोक लगाना भी राजधानी में बैठे उच्चाधिकारियों के लिए सम्भव नहीं है क्योंकि वे भी इसी भ्रष्टाचार के टाईटैनिक जहाज पर सवार है जो निश्चित रूप से एक ना एक दिन अवश्य डूबेगा।

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