बुरी नही है अप्रसन्नता – ओशो

मनुष्य अत्यधिक प्रसन्न हो सकता है , इसकी संभावना है । इसीलिए उसकी अप्रसन्नता है । जब तुम्हें लगता है कि तुम एक अंधेरी घाटी में हो और शिखर पर पहुंच सकते हो , यह संभावना और तुलना तुम्हारी अप्रसन्नता का कारण है । जो व्यक्ति जितना ग्रहणशील है , उतना ही अप्रसन्न है । जो व्यक्ति जितना संवेदनशील है , उतना ही अप्रसन्न होता है । व्यक्ति जितना अधिक सजग है , उतना ही अप्रसन्न होता है । अप्रसन्नता बुरी बात नहीं है । यही वह प्रेरक तत्व है जो तुम्हें ओशो शिखर पर लेकर जाएगा । यदि तुम अंधेरीघाटी में अप्रसन्न नहीं हो , तो तुमऊपर पर्वत पर आरोहण का कोई प्रयास क्यों करोगे ? तुम इस बात के प्रति सजगहो कि तुम एक बीज हो और वृक्षहो सकते हो । लक्ष्य बहुत दूर नहीं है , यही तुमको अप्रसन्न कर देता है।शुभ है यह संकेत।गहनता से अप्रसन्नता का अनुभव करना पहला कदम है । किंतु मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुमको अपनी अप्रसन्नता को निर्मित करना चाहिए।मैं कह रहा हूं कि यह शुभ है , क्योंकि यह तुमको परिवर्तन के लिए उकसाती है ।

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