एक कप चाय और तुम…

पुस्तक समीक्षा
एक कप चाय और तुम
लेखक:- सुनील पंवार
सृष्टि प्रकाशन चंडीगढ़,भारत
मूल्य :- 150/-

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एक विद्यार्थी द्वारा किसी पुस्तक की समीक्षा करना मेरे ख़्याल में सम्भव नहीं हो पाता क्योंकि, वो साहित्यिक शब्दों से अपूर्ण होता है, फिर भी मैं अपनें कुछ शब्द भण्डार से निष्पक्ष समीक्षा करनें की कोशिश कर रहा हूँ, आशा है इस कार्य में सफल हो पाऊंगा।

पुस्तक ‘एक कप चाय और तुम’ वो संग्रह हैं जिसनें मुझे बहुत कुछ सिखाया हैं क्योंकि इस कहानी संग्रह में लेखक सुनील पंवार के जीवन के शुरूआती दौर के बारे में बताया गया है कि किस प्रकार से आपके घर की स्थिति दयनीय होती है और आप पॉकेटमनी से पहली बार ‘सरिता’, ‘सरस सलिल’, ‘गृहशोभा, जैसी मासिक पत्रिकाएं खरीदकर पढ़ते है।

आपनें कई विकट परिस्थितियों से गुजरते हुए सफलता प्राप्त की है, खासकर इस पुस्तक के माध्यम से आपनें एक बड़े साहित्यकार की भूमिका निभाई है।

पुस्तक में 20 कहानियों को पढ़कर अलग-अलग नज़रिए से देखा तो महसूस हुआ कि ये कहानियाँ हमें बहुत कुछ सीखाती है।

जब रात के प्रहर में पुस्तक मेरे हाथों में आई तो एक अलग ही ख़ुशी महसूस हुई और उसी समय 9 बजे से अनवरत पढ़नें का सफर शुरू हुआ जो रात्रि 12 बजे तक पूर्ण हो गया।

हर कहानी रोचकता, रोमांचक, मार्मिकता से भरी हुई आँखों के सामनें प्रतिबिम्ब बनता चला गया।

यदि कहानियों की बात की जाए , तो पहली कहानी ‘आख़िरी कॉल’ बहुत कुछ सवाल करती रही जब तक कहानी का अंत न हुआ, एक के बाद एक दृश्य फ़िल्म की तरह चलते हुए जीवन्त चलचित्र की भाँति चलनें लगे।

कहानी ‘भीगी मुस्कान’ पढ़कर तो मानो आँखें ही भीग गई जब नायिका का प्रेमभाव उमड़कर सामनें आता है, प्रेमभाव से भरी हुई यह कहानी हृदय में ख़ास स्थान बनाती है।

‘एक नदी का फ़ासला’ कहानी मनोरम दृश्य के साथ प्रस्तुत की गई है, ऐसा प्रतीत होता है, जैसे हम स्वंय कहीं छिप कर नदी के किनारे चित्र बनाते चित्रकार और नायिका को देख रहें है जो अपने खुशहाल गाँव के बिखर जाने के गम में नदी को दोष दे रही है। इस कहानी के अलग-अलग दृश्य मार्मिकता लिए हुए अनोखा संगम बना रहे है और जब नायक अपनी पेंटिंग उस नायिका को देता है तब ये खूबसूरत दृश्य पाठक मन को हर्षित कर देता है। कहानी में प्रकृति सौंदर्य को लेखक ने बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया है।
कहानी ‘इश्क़ ऑनलाइन’ एक सीख देती है कि अत्याधिक ऑनलाइन रहना और सोशल मिडिया प्रेम का परिणाम कितना घातक सिद्ध हो सकता है। लेखक ने इस कहानी को शैलीबद्ध करके भावी पीढ़ी को नई दिशा देने का प्रयास किया है।
‘इन्तहा’ कहानी तब मार्मिक बन जाती है जब नायिका अपने प्रियतम का इंतजार करती है। नायिका के मन की व्याकुलता और विरहाग्नि आँखों से अश्क़ बहाने पर विवश कर करती हुई ह्रदयतल तक पहुँच जाती है।
पुस्तक का शीर्षक एवं अतिमहत्वपूर्ण कहानी ‘एक कप चाय और…तुम’! रोमांचक अल्फ़ाज़ों से पूर्ण, दिल को छू लेती है और पाठक को आनन्द की अनुभूति कराती है।
‘बन्द कॉटेज’ एक रहस्यमयी कहानी है जो अंत में हकीकत उजागर कर देती है। लेखक द्वारा शब्दों की पकड़ मजबूत होने की वजह से हम ऊब नहीं पाते बल्कि निरन्तर पढ़ते जाते है।
पुस्तक में चार भाग ‘सुखिया’ कहानी के हैं जो लेखक के अपने पारिवारिक जीवन से जुड़े हुए हालातों को उजागर करती है एवं वर्तमान संदर्भों से जोड़ती है। ‘सुखिया’ भाग की सभी कहानियाँ अस्पृश्यता,जातिवाद, छुआछूत और भेदभाव के बारे में बताती है जो सामाजिक हालातों को बयाँ करतीं है। सुखिया द्वारा उस समय की सामाजिक व्यवस्थाओं पर सवाल उठाये गए है।
कहानी ‘एक खनकती आवाज’ का तो कहना ही क्या! इस कहानी में हिन्दी भाषा के साथ-साथ मारवाड़ी बोली के शब्द भी पढ़ने को मिलते हैं, लेखक ने वर्ष 2007 की रात को घटित अपनी एक वास्तविक घटना को कलमबद्ध जिसे शायद लेखक कभी भुला नहीं पाए। आत्मिक प्रेम भाव से परिपूर्ण ये कहानी अंतर्मन को छू लेती हैं।
‘बिना पते की चिट्ठियाँ’ कहानी के मर्म में बचपन छिपा हुआ है। एक माँ की ममता को दर्शाया है। लेखक ने ऐसा मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया जो किसी को भी भाव विभोर कर देगा। इसका भाव बेजोड़ है।
इसी के साथ लेखक ने स्व. डॉ.मिथिलेश कुमारी मिश्र को ‘छँटता कोहरा’ कहानी समर्पित की है जो एक वास्तविक व अनूठा यात्रा वृत्तांत है। जो इसका मर्म समझ जाए उसके ह्रदय में छाप छोड़ दे क्योंकि एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी किसी शख्सियत को खोने का गम क्या होता है वो तो वो ही समझ सकता है जिसने उसे खोया है।
‘चुनावी मुद्दा’ में लेखक ने राजनेताओं के चुनावी भाषण और खोखले वादों के बारे में बताया है कि किस प्रकार भोली-भाली जनता को अपने चुनावी भाषणों से बहकाते है। चुनावी मुद्दों की बातों को उजागर करना हर किसी के बस की बात नही है परंतु, लेखक ने हकीकत को उजागर करने का भरकस प्रयास किया है। इसी कहानी में दलित व पिछड़ी बस्तियों के जीवन्त चित्रण देखने को मिलता है।
‘चौकीदार’ एक मासूम की जिंदगी के बारे में बताती है इसमें लेखक द्वारा कम शब्दों में बहुत कुछ बताने का प्रयास किया है और वो इसमें सफल होते नज़र आ रहे हैं। कहानी में मार्मिकता भी है और डर भी। मासूम से सवाल भी हैं जिनका जवाब दे पाना मुश्किल है।
कहानी ‘वो रात’ कहने को तो दो शब्द हैं पर लेखक ने जिस एक रात का भयावह मंजर दिखाने का प्रयास किया है वो हर किसी को झकझोर कर रख देने की क्षमता रखता है।कहानी के शब्द और भावार्थ नए-नए सीखने को मिलते है और ये सकारात्मकता की ओर बढ़ने की पहल करती हुई एक मार्मिक कहानी बन पड़ती है।
‘डायरी 2001’ में लेखक की बेजोड़ कृति हैं। सौलह वर्ष की उम्र में लिखी वो डायरी जिसमें दिल के जज्बात और कुछ अल्फ़ाजों को साझा किया है, लड़कपन के प्रेम को दर्शाकर सूखे पड़े तालाबों में मानो जल भर दिया हो। कहानी लड़कपन के प्रेम से परिचय तो करवाती ही है साथ ही साथ युवा मन की हसरतों की आग को हवा भी देती है। इस कहानी का सृजन अनूठा व निराला है।
अंतिम कहानी ‘सच का आईना’ पढ़कर ह्रदयद्रवित हो जाता है, कोई कठोर दिल वाला ही होगा जिसके आँखों से एक अश्क़ की बून्द भी न आई हो। लेखक किस प्रकार से अपने जीवन में जूझते रहना पर फिर भी हिम्मत न हारना और वो कर दिखाना जो हर किसी के बस की बात नहीं हैं। एक सकारात्मक संदेश देती है।
पुस्तक ‘एक कप चाय और तुम’ का अगर सम्पूर्ण सारांश कहें तो हर कहानी को लेखक ने अपने जज्बे और लगन से एक साहित्यकार की भूमिका बखूबी निराले ढंग से निभाई है।
सच कहूँ, तो ये कृति पढ़कर अहसास हो गया कि मार्मिकता, ममता, प्रेम, दर्द, विरह और संवेदनाएं क्या होती है, इन सभी सवालों के जवाब मिलते नज़र आते हैं। हर एक लेखक इतना परिपूर्ण नहीं होता कि अपने हुनर से हर राह आसान कर दे परन्तु, सुनील पंवार में वो काबिलियत, वो जज्बा और दक्षता नज़र आ रही है जो हमें निराश नहीं करती और साहित्य के क्षेत्र में उनमें काफ़ी संभावनाएं नज़र आती दिख रही है।
लेखक सुनील पंवार का मैं शुक्रगुजार रहूंगा जिन्होंने हमें बेजोड़ कृति ‘एक कप चाय और तुम’ को पढ़ने का मौक़ा दिया। मैं लेखक के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।।

~ अरविन्द कालमा
भादरुणा (साँचोर)
राजस्थान

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