जिला ही नहीं बाहरी राज्यों के मरीज भी स्वस्थ होने लगे महासमुंद के डेडिकेटेड कोविड़ अस्पताल में, डेडिकेटेड कोविड अस्पताल में 15 दिनों में कुल 76 हुए एडमिट और 44 डिस्चार्ज

लक्ष्य रजक,महासमुंद।इन दिनों जिस गति से कोविड-19 की महामारी पांव पसार रही है उतनी ही शीघ्रता से संक्रमण को मात देकर स्वस्थ होने वालों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। कोरोना से जंग जीतने वाले फाइटर्स (मरीजों) की मानें तो कलेक्टर श्री कार्तिकेया गोयल के निर्देशन एवं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डाॅ. आर. के. परदल के मार्गदर्शन में अनुभवी चिकित्सकीय अमले की लगन साफ दिखाई दे रही है। जिनकी दिन-रात की लगन और मेहनत से कुछ ऐसे गंभीर प्रकरणों में भी मरीजों को नया जीवन मिला, जिनमें कुछ ने तो जीने की उम्मीद तक छोड़ दी थी और कुछ ऐसे भी मिले जिन्होंने बाहरी राज्य का निवासी होने के बावजूद महासमुंद जिले में ही कोविड का उपचार लेना बेहतर समझा। भर्ती हुए एक मरीज ने बताया कि वे 70 वर्ष के हैं। उन्हें निमोनिया की परेशानी होने पर वे शहर के स्थानीय निजी चिकित्सालय में उपचार ले रहे थे। इस दौरान उनके चिकित्सक की सलाह पर उन्होंने कोविड-19 की जांच कराई और परिणाम धनात्मक मिलने पर वे डेडिकेटेड कोविड अस्पताल में भर्ती हो गए।

उन्होंने बताया कि भर्ती होते ही उपचार तत्काल शुरू कर दिया गया। ऑक्सीजन लगा कर जीवनरक्षक दवाओं सहित इन्जेक्शन्स भी लगाए गए। पहले घंटे से ही उन्हें राहत महसूस होने लगी और महज 10 दिनों में केवल वे ही नहीं बल्कि उनके साथ उपचार ले रहे 7 अन्य मरीज भी स्वस्थ होकर अपने-अपने घरों की ओर लौट गए। वे कहते हैं कि यहां मेट्रो सिटी जैसे बड़े-बड़े शहरों के नामी चिकित्सालयों से भी बेहतर चिकित्सकीय सेवाएं मिली, यही कारण है कि उन्होंने हालिया दौर में जिला भ्रमण पर रही राजाखरियार, ओड़िशा निवासी अपनी 67 वर्षीय बहन का उपचार भी जिले के डेडिकेटेट कोविड अस्पताल में ही करवाया और आज वे भी कोविड-19 से मुक्त हैं। स्वस्थ होकर घर लौटने का श्रेय वे यहां की चिकित्सकीय सेवा सुविधाओं को देखते हुए बताते हैं कि उपचार के दौरान एक भी दवा बाहर से नहीं मंगवानी पड़ी, नाश्ता और भोजन भी बराबर सही समय पर मिलता था। चिकित्सक और नर्सिंग स्टाफ की पूछ-परख, निगरानी और समुचित देख-भाल से यहां मरीजों को जल्द स्वास्थ्य लाभ मिल रहा है।
तीसरा एवं चौथा प्रकरण क्रमशः शहर के गुड़रू पारा के 58 वर्षीय बीपी व शुगर के मरीज और उनके कोविड पाॅजिटिव भाई का है। वे बताते हैं कि उन्हें एकाएक सांस लेने में परेशानी होने लगी थी, किन्तु बार-बार जांच कराने के बाद भी उनकी कोविड-19 रिपोर्ट ऋणात्मक ही मिल रही थी। वे जानते थे कि उन्हें पहले अनियमित रक्चाप और मधुमेह की पीड़ा सता चुकी थी, ऐसे में तकलीफ बढ़ती देख चिकित्सकों की सलाह पर बिना देर किए वे डेडिकेटेड कोविड अस्पताल में भर्ती हो गए और उनके भाई को होम आइसोलेशन में रखा गया। शुरूआती दौर में उनकी हालत इतनी नाजुक थी कि ऑक्सीजन लगाने तक की नौबत आ गई। फिर जल्द ही स्वास्थ्य में सुधार दिखने लगा। इस दौरान दोनों भाइयों ने निरंतर चिकित्सकीय परामर्श एवं उपचार में सहयोग बनाए रखा। आज दोनों पूरी तरह स्वस्थ होकर कोरोना वायरस से जंग जीत चुके हैं।
उन्होंने आमजन से अपील की है कि कोरोना से जीतने के लिए सबसे अहम है जागरूकता के साथ विश्वास तत्व। सर्दी, खांसी, बुखार जैसे लक्षण दिखते ही जांच कराने के अनुरोध किया है। साथ ही स्वस्थ रहने के लिए स्वयं के द्वारा अपनाए गए तरीकों के बारे में बताते हुए एलोपैथिक दवाओं के अतिरिक्त उन्होंने आयुर्वेदिक काढ़े एवं भाप के सेवन पर विशेष जोर देते हुए इन्हें अभ्यास में लाने की सलाह भी दी है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डाॅ. आर.के. परदल ने बताया कि विगत पखवाड़े भर में ही डेडिकेटेड कोविड अस्पताल में कुल 76 मरीज भर्ती हुए, उपचार उपरांत इनमें से 44 को डिस्चार्ज भी किया जा चुका है। वहीं, 7 मरीज ऐसे रहे जो अपनी स्वेच्छा से और एक चिकित्सकों की अनुमति से रिफर हुए। स्वस्थ होकर लौटने वालों की तुलना में मृत्यु का आंकड़ा 04 प्रकरणों तक ही सीमित रहा। इनमें भी मरीजों में पहले से ही अन्य कई तरह की गंभीर बीमारियों का प्रभावी होना ही प्रमुख कारण माना जा रहा है।
डाॅ. परदल ने बताया कि डेडिकेटेड कोविड अस्पताल में डाॅ. कुलवंत आजमानी, डाॅ. के. गजभिए, डाॅ. हेमेश्वरी वर्मा, डाॅ. दिनेश सिन्हा, डाॅ. ओंकेश्वरी साहू व डाॅ. शुभा एक्का के सुपरविजन में पालीवार जिले के सबसे उम्दा चिकित्सकीय दल को ड्यूटी पर लगाया गया है। जिसमें सिस्टर इंचार्ज मीना तारन, स्टाफ नर्स वाटिका गोयल एवं फार्मासिस्ट श्री पंकज साहू सहित संलग्न नर्सिंग स्टाफ व स्वास्थ्यकर्मी चैबीसों घंटे मरीजों की सेवा में जुटे हुए हैं। सीसीटीवी निगरानी, आवश्यक दवा भंडारण एवं ऑक्सीजन और सक्शन मशीन तक की व्यवस्था है, जो विषम परिस्थितियों में भी मरीजों को खतरे से बाहर निकालने में कारगर साबित हो रहे हैं।

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